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ED का बड़ा ऑपरेशन: यूपी, झारखंड और गुजरात में कोडीन कफ सिरप तस्करी रैकेट पर छापे

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भारत में नशीली दवाओं की तस्करी एक गंभीर समस्या बन चुकी है, और अब कोडीन युक्त कफ सिरप इस गिरोह का नया हथियार बन गया है। ये सिरप, जो मूल रूप से खांसी की दवा के रूप में बने हैं, अब सस्ते नशे का साधन बनकर युवाओं को अपनी चपेट में ले रहे हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने हाल ही में एक बड़े रैकेट का भंडाफोड़ किया, जिसमें उत्तर प्रदेश, झारखंड और गुजरात में 25 स्थानों पर छापे मारे गए। इस रैकेट की अनुमानित कीमत 1000 करोड़ रुपये से अधिक है, जिसमें फर्जी कंपनियां बनाकर, नकली बिलिंग और बेनामी लेनदेन के जरिए करोड़ों की कमाई की गई। मुख्य आरोपी दुबई भाग चुका है, जबकि कई सहयोगी गिरफ्तार हो चुके हैं। यह कार्रवाई न केवल अवैध व्यापार को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज में नशे की बढ़ती लत और सीमा पार तस्करी के खतरे को भी उजागर करती है। सरकार और एजेंसियां मिलकर इस जाल को तोड़ रही हैं, ताकि युवा पीढ़ी सुरक्षित रहे और स्वास्थ्य पर खतरा कम हो। यह घटना हमें सतर्क करती है कि सामान्य दिखने वाली दवाएं भी कितनी खतरनाक हो सकती हैं।

कोडीन कफ सिरप तस्करी रैकेट: ईडी की छापेमारी से बड़ा खुलासा

भारत में नशीले पदार्थों की तस्करी दिन-ब-दिन नई रूप ले रही है। अब खांसी की साधारण दवा के रूप में बिकने वाली कोडीन युक्त कफ सिरप अवैध नशे का बड़ा स्रोत बन गई है। कोडीन एक ओपियोइड है, जो नशे की लत लगाने में सक्षम होता है। हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस तरह के एक विशाल रैकेट पर बड़ी कार्रवाई की है। दिसंबर 2025 में ईडी की लखनऊ जोनल यूनिट ने उत्तर प्रदेश, झारखंड और गुजरात में एक साथ 25 स्थानों पर छापे मारे। इस ऑपरेशन में केंद्रीय बलों की मदद ली गई और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और लक्जरी सामान जब्त किए गए।

यह मामला मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है, इसलिए ईडी ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत एनफोर्समेंट केस इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज की। इस रिपोर्ट में कुल 67 लोगों को आरोपी बनाया गया है। जांच की आधार उत्तर प्रदेश पुलिस, एसटीएफ और फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफएसडीए) द्वारा दर्ज 24 से अधिक एफआईआर हैं। ये एफआईआर पिछले एक साल में लखनऊ, वाराणसी, गाजियाबाद, सहारनपुर, जौनपुर, सोनभद्र समेत कई जिलों में दर्ज हुईं।

रैकेट कैसे काम करता था?

यह रैकेट बेहद संगठित और बहुस्तरीय था। आरोपी वैध फार्मा कंपनियों से कोडीन युक्त सिरप खरीदते थे, लेकिन इन्हें चिकित्सकीय उपयोग के बजाय काले बाजार में बेचते थे। फर्जी स्टॉक एंट्री, नकली बिलिंग और बेनामी डिस्ट्रीब्यूशन चेन के जरिए करोड़ों की कमाई होती थी। जांच में पता चला कि 700 से अधिक फर्जी फर्में बनाई गईं, जो केवल कागजों पर अस्तित्व में थीं। इन फर्मों के जरिए अरबों रुपये का टर्नओवर दिखाया जाता था। कुछ रिपोर्ट्स में 189 से 454 तक फर्जी कंपनियों का जिक्र है, जो रांची और अहमदाबाद जैसे शहरों से जुड़ी थीं।

सिरप उत्तर प्रदेश के 28 जिलों से शुरू होकर बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल होते हुए नेपाल और बांग्लादेश पहुंचाई जाती थी। कुछ खेप पाकिस्तान तक जाने की आशंका है। मुख्य ब्रांड जैसे फेनसेडिल को सस्ते नशे के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। यह सिरप शेड्यूल एच दवा है, जिसे केवल डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर बेचा जा सकता है, लेकिन रैकेट ने नियमों को ताक पर रख दिया।

मुख्य आरोपी कौन हैं?

इस रैकेट का सरगना वाराणसी का शुभम जायसवाल बताया जा रहा है, जो वर्तमान में फरार है और दुबई में छिपा होने की संभावना है। उसके पिता भोला प्रसाद जायसवाल गिरफ्तार हो चुके हैं। अन्य प्रमुख नामों में सहारनपुर के भाई विभोर राणा और विशाल राणा, बर्खास्त पुलिस कांस्टेबल अलोक प्रताप सिंह, अमित सिंह (अमित टाटा), चार्टर्ड अकाउंटेंट विष्णु अग्रवाल शामिल हैं। अलोक सिंह के लखनऊ स्थित आलीशान बंगले पर छापे के दौरान लोग हैरान रह गए, क्योंकि एक साधारण कांस्टेबल की इतनी संपत्ति कैसे संभव है? यहां से प्राडा, गुच्ची बैग्स और राडो घड़ियां मिलीं।

शुभम जायसवाल के घर से भी लक्जरी आइटम बरामद हुए। ईडी ने उसके वाराणसी स्थित संपत्तियों पर नोटिस चिपकाए हैं। अब गैर-जमानती वारंट और रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने की तैयारी है।

छापेमारी में क्या मिला?

छापों में हजारों बोतलें कफ सिरप, फर्जी दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल डिवाइस और कैश ट्रांजेक्शन के सबूत मिले। रांची की एक फर्म से 189 फर्जी कंपनियों के रिकॉर्ड जब्त हुए, जिनसे 400-450 करोड़ का लेनदेन हुआ। अहमदाबाद और सूरत जैसे औद्योगिक क्षेत्रों को सप्लाई चेन का हिस्सा पाया गया। ईडी अब बैंक अकाउंट फ्रीज करने, संपत्तियां अटैच करने और आरोपी को समन भेजने की प्रक्रिया में है।

सामाजिक और स्वास्थ्य प्रभाव

कोडीन की लत युवाओं में तेजी से फैल रही है। यह सस्ता होने के कारण गरीब तबके में लोकप्रिय है, लेकिन लंबे समय में यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करता है – जैसे लिवर डैमेज, सांस की तकलीफ और मौत तक। सीमा पार तस्करी से अंतरराष्ट्रीय अपराध भी जुड़ जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने एसआईटी गठित की है, और योगी सरकार की सख्ती से यह रैकेट उजागर हुआ।

यह मामला दर्शाता है कि फार्मा इंडस्ट्री में नियमन की कितनी जरूरत है। वैध दवाओं का दुरुपयोग रोकने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग और सख्त लाइसेंसिंग जरूरी है।

आगे की जांच

ईडी की जांच जारी है। अधिक फर्मों और लिंक्स का पता लगाया जा रहा है। पुलिस ने अब तक 32 गिरफ्तारियां की हैं। यह कार्रवाई न केवल इस रैकेट को खत्म करेगी, बल्कि अन्य गिरोहों को भी सबक सिखाएगी। समाज को भी जागरूक होना होगा कि कोई दवा बिना डॉक्टर की सलाह के न लें।

यह घटना हमें याद दिलाती है कि अपराध के नए रूप कितने चालाक होते हैं, लेकिन कानून की मजबूत पकड़ से कोई नहीं बच सकता।

डिस्क्लेमर:

यह लेख केवल सूचना और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी सार्वजनिक समाचार स्रोतों पर आधारित है और किसी व्यक्ति या समूह को दोषी ठहराने का इरादा नहीं है। जांच जारी है, और अंतिम फैसला अदालत का होगा। कोई भी दवा का उपयोग डॉक्टर की सलाह से ही करें। नशीली दवाओं से दूर रहें।

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